Thursday, March 26, 2026
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आंदोलन का चुनावी अंदाज

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री

किसानों के नाम पर आंदोलन की शुरुआत शाहीनबाग अंदाज में हुई थी। उसकी तरह ही असत्य पर आधारित अभियान चलाया जा रहा है। सीएए ने नागरिकता प्रदान करने का प्रावधान किया गया था। जबकि आंदोलन इस बात कर किया गया कि सरकार वर्ग विशेष की नागरिकता छीन लेगी लेकिन कुछ ही समय में ऐसा कहने वाले बेनकाब हुए।

देश में अस्सी प्रतिशत से अधिक किसान छोटी जोत वाले हैं। आंदोलन के नेताओं को इनकी कोई चिंता नहीं है। आंदोलन का स्वरूप अभिजात्य वर्गीय है। ऐसा आंदोलन नौ महीने क्या नौ वर्ष तक चल सकता है। आंदोलन के नेता कृषि कानूनों का काला बता रहे हैं। लेकिन उनके पास इस बात का जवाब नहीं है कि इसमें काला क्या है, वह कह रहे है कि किसानों की जमीन छीन ली जाएगी लेकिन उनके पास इसका जवाब नहीं कि किस प्रकार किसानों की जमीन छीन ली जाएगी। कॉन्ट्रैक्ट कृषि तो पहले से चल रही है। किसानों को इसका लाभ मिल रहा है। ऐसा करने वाले किसी भी किसान की जमीन नहीं छीनी गई।

जाहिर है कि यह आंदोलन भी सीएए की तरह विशुद्ध राजनीतिक है। इससे किसानों का कोई लेना देना नहीं है। इसमें किसान हित का कोई विचार समाहित नहीं है। सीएए विरोधी आंदोलन जल्दी समाप्त हो गया। लेकिन इस आंदोलन में किसान शब्द जुड़ा है। इसका लाभ मिल रहा है। इसी नाम के कारण सरकार ने बारह बार इनसे वार्ता की।

किसी ने यह नहीं कहा कि पुरानी व्यवस्था में किसान खुशहाल थे इसलिए वे सुधारों का विरोध कर रहे हैं। जबकि सुधार तथ्यों पर आधारित है। इसका विरोध कल्पनाओं पर आधारित है। मात्र कल्पना के आधार पर आंदोलन चलाया जा रहा है। सरकार के विरोध में विपक्ष ने अपने हितों का भी ध्यान नहीं रखा। सत्ता पक्ष ने उनको बिचौलियों के बचाव हेतु परेशान बताया। क्योंकि विधेयकों के माध्यम से बिचौलियों को ही दूर किया गया। मंडियां समाप्त नहीं होंगी, न्यूनतम समर्थन मूल्य जारी रहेगा, किसानों को अपनी मर्जी से उपज बेचने का अधिकार मिला। ऐसे में विरोध का कोई औचित्य या आधार ही नहीं था। विरोध में सर्वाधिक मुखर दलों को सत्ता में रहने का अवसर मिलता रहा है।

स्वामीनाथन समिति का गठन यूपीए सरकार ने किया था। उसकी सिफारिशों पर मोदी सरकार अमल कर रही है। कुछ दिन पहले कांग्रेस सवाल करती थी कि स्वामीनाथन रिपोर्ट कब लागू होगी। सरकार अमल कर रही है तो हंगामा किया जा रहा है। यह दोहरा आचरण कांग्रेस के लिए हानिकारक है। जाहिर है कि विपक्ष पिछली व्यवस्था के लाभ बताने की स्थिति में नहीं है।

पुरानी व्यवस्था में अनेक कमियां थी। इसमें किसानों पर ही बन्धन थे, वही परेशान होते थे। इस व्यवस्था में वे लोग लाभ उठा रहे थे, जो किसान नहीं थे। वह किसानों की तरह मेहनत नहीं करते थे, उन्हें फसल पर मौसम की मार से कोई लेना देना नहीं था। ऐसे में इस आंदोलन से किसका लाभ हो सकता है। आंदोलन किसके बचाव हेतु चल रहा है। इसमें किसानों का हित नजरअंदाज किया जा रहा है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तो पुरानी व्यवस्था में लाभ उठाने वालों के गिरोह का उल्लेख किया है। कहा कि देश में अब तक उपज और बिक्री के बीच में ताकतवर गिरोह पैदा हो गए थे। यह किसानों की मजबूरी का फायदा उठा रहे थे। जबकि इस कानून के आने से किसान अपनी मर्जी और फसल दोनों के मालिक होंगे। उन्होंने देश के किसानों को आश्वस्त किया कि देश में न तो न्यूनतम समर्थन मूल्य खत्म होगा ना ही कृषि मंडियां समाप्त होंगी।

कांग्रेस किसानों को भ्रमित कर रही है। कांग्रेस ने शुरू से ही देश के किसानों को कानून के नाम पर अनेक बंधनों से जकड़ रखा है। आज तक किसानों के हित में कोई फैसला नहीं लिया। आज जब कृषि सुधार के प्रयास किए जा रहे हैं तो किसानों को गुमराह किया जा रहा है। देश में एमएसपी अनवरत जारी है। फसल मंडियां अपनी जगह यथावत है। लेकिन कांग्रेस पार्टी किसानों को यह कह कर गुमराह कर रही है कि एमएसपी खत्म हो जाएगी। मंडियों को खत्म कर दिया जाएगा। सरकार ने किसानों को अधिकार के लिए ऐतिहासिक कानून बनाये हैं। यह कृषि सुधार इक्कीसवीं सदी के भारत की जरूरत है।

(लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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