28 अक्टूबर 2023 की रात 8 बजे संस्था की ओर से एक तरही शेरी नशिस्त डॉ ताहिर यूसुफ़ के आवास पर रखी गई। जिसकी सदारत जमील आज़मी ने फरमाई और निज़ामत शेख़ शम्स ने की। नशिस्त में मुख्यअतिथि के तौर पर डॉ हबीबुल्लाह ने शिरकत की जबकि विशिष्टअतिथि मुशफ़िक़ अहमद रहे।
नशिस्त की शुरुआत सुफ़ियान मुजीब व ख़ालिद बेग ने नात पढ़कर की। इसके बाद सभी शायरों ने मिसरा तरह “तेरी जानिब बढ़े मेरे क़दम आहिस्ता आहिस्ता” पर अपने अपने कलाम पेश किए।
मिटा जाता है अब अहसासे ग़म आहिस्ता आहिस्ता
मुझे रास आ गया उनका सितम आहिस्ता आहिस्ता
जमील आज़मी
नफ़स की आमद व शुद का है आरा शजरे-हस्ती पर
बढ़े जाते हैं हम सूए-अदम आहिस्ता आहिस्ता
मुजीब सिद्दीक़ी
मुझे एहसास है उन दोस्तों का जो ये करते हैं
करम ज़ाहिर में बातिन में सितम आहिस्ता आहिस्ता
नियाज़ क़मर
अगर अहले नज़र अहले सुख़न की क़द्र है दिल में
तो बन जाओगे तुम अहले क़लम आहिस्ता आहिस्ता
डॉ असलम हाशमी
कहाँ तक दूसरों का साथ ढूंढेंगे नज़ीर आख़िर
बढ़ाएं आप अब अपने क़दम आहिस्ता आहिस्ता
नज़ीर गोंडवी
पड़े उनके मुबारक जब क़दम आहिस्ता आहिस्ता
हुए बीमार सारे ताज़ादम आहिस्ता आहिस्ता
नजमी कमाल
तो हट जाएँ निगाहों से फ़रेबे ज़ुल्म के पर्दे
हक़ीक़त गर लिखें अहले क़लम आहिस्ता आहिस्ता
अज़्म गोंडवी
हमें कब जानते थे लोग नावाकिफ था सारा शह्र
तेरे सदके गए पहचाने हम आहिस्ता आहिस्ता
अफसर हसन
सुना है तेरी गर्दन में है इक सरिया तकब्बुर का
लगेगी ज़ंग तो आएगा ख़म आहिस्ता आहिस्ता
अंजुम वारसी
तुम्हारे ज़ुल्म को करके रक़म आहिस्ता आहिस्ता
कहीं नेज़ा न बन जाये क़लम आहिस्ता आहिस्ता
क़ासिम गोंडवी
शबाबे वक़्त होता है ज़वाले वक़्त होता है
निकल जाता है सूरज का भी दम आहिस्ता आहिस्ता
वक़ार हरचन्दवी
ज़माने भर में बस वो ही नई तारीख़ लिखते हैं
कभी बढ़ते नहीं जिनके क़दम आहिस्ता आहिस्ता
ईमान गोंडवी
किसी भी और नुस्ख़े से शिफ़ायबी नहीं मुमकिन
करो सीने पे लफ़्ज़े कुन से दम आहिस्ता आहिस्ता
नदीम आतिफ़
इसके अलावा मुजीब अहमद, हैदर गोंडवी, आतिफ़ गोंडवी, खालिद बेग, अतीकुर्रहमान, सुफियान गोंडवी, अल्हाज गोंडवी, अभिषेक श्रीवास्तव, अरबाज़ ईमानी वगैरा ने भी अपने अपने तरही कलाम पेश किए!
इस मौके पर ख़ास तौर से बशीर अहमद, ज़ैनुल आबिदीन,
इरशाद अहमद, ज़क़ाउल्लाह, डॉक्टर तल्हा, वारिस अली, शबाहत हुसैन वगैरा मौजूद रहे!
अंत में डॉक्टर ताहिर युफुस ने धन्यवाद किया।
