डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा
लाख प्रयासों के बावजूद देश की अदालतों में मुकदमों का अंबार कम होने का नाम ही नहीं ले रहा है। एक मोटे अनुमान के अनुसार देश की अदालतों में सात करोड़ से अधिक केस लंबित हैं। इनमें से करीब 87 फीसदी केस देश की निचली अदालतों में लंबित हैं तो करीब 12 फीसदी केस राज्यों के उच्च न्यायालयों में लंबित चल रहे हैं। देश की सर्वोच्च अदालत में एक प्रतिशत केस लंबित हैं। पिछले दिनों जयपुर में आयोजित एक समारोह के दौरान न्यायालयीय प्रक्रिया और सर्वोच्च न्यायालय में पैरवी करने वाले वकीलों की फीस को लेकर अच्छी खासी चर्चा हुई। इस समय अदालत में सुबह साढ़े नौ बजे सुनवाई आरंभ करने की पहल पर भी विमर्श जारी है। सरकार ने मानसून सत्र में कुछ बदलावों के साथ मध्यस्थता विधेयक लाने का संकेत दिया है।
न्यायालयों में मुकदमों के अंबार से सभी पक्ष चिंतित हैं। इस अंबार को कम करने के लिए कोई ऐसी रणनीति बनानी होगी जिससे अदालतों का भार भी कम हो न्यायिक प्रक्रिया लंबी भी न चले और लोगों को समय पर न्याय भी मिले। पिछले पांच साल में देश में लंबित केस की संख्या चार करोड़ से बढ़कर सात करोड़ हो चुकी है। हालांकि लोक अदालत के माध्यम से मुकदमों में कमी लाने की सार्थक पहल अवश्य की गई है पर लोक अदालतों में लाखों प्रकरणों के निबटने के बावजूद हालात में ज्यादा बदलाव नहीं आया है। मामूली कहासुनी के केस जिसमें शांति भंग के प्रकरण शामिल हैं उन्हें भी तारीख दर तारीख के स्थान पर एक ही तारीख में निपटा दिया जाए तो हल संभव है। इसी तरह से राजनीतिक प्रदर्शनों को लेकर दर्ज होने वाले मुकदमों के निस्तारण की भी कार्ययोजना तय करनी जरूरी है। इससे कम ग्रेविटी के केस का सहज निस्तारण संभव होगा और न्यायालयों का समय भी बचेगा।
इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारे देश की अदालतों में ब्रिटेन आदि की अदालतों से कई गुना अधिक केस एक दिन में सुने जाते हैं। केन्द्रीय कानून मंत्री किरेन रिजिजू की माने तो इंग्लैंड में एक न्यायाधीश एक दिन में तीन से चार मामलों में निर्णय देते हैं जबकि हमारे देश में प्रत्येक न्यायाधीश औसतन प्रतिदिन 40 से 50 मामलों में सुनवाई करते हैं। यह इस ओर भी इंगित करता है कि हमारे देश में न्यायाधीशों के पास कार्यभार अधिक है। अधिक काम करने के बावजूद मुकदमों की संख्या कम होने का नाम ही नहीं लेती। पिछले कुछ समय से जिस तरह से पीएलआई को लेकर न्यायमूर्तियों द्वारा प्रतिक्रिया व्यक्त की जा रही है और जुर्माना लगाया जा रहा है उसके भी सकारात्मक परिणाम प्राप्त होने लगे हैं।
न्यायालयों की मध्यस्थता के लिए भेजे जाने वाले मामलों में वादी-प्रतिवादी द्वारा गंभीरता नहीं दिखाने से भी हालात अधिक सुधरे नहीं हैं। दरअसल मध्यस्थता से होने वाले निर्णय की पालना को लेकर अभी भी लोग संदेह में ही रहते हैं। देखा जाए तो अदालतों की सामान्य प्रक्रिया पर ही लोगों का विश्वास है। चारों तरफ से निराश और हताश व्यक्ति न्याय के लिए अदालतों का दरवाजा खटखटाता है। ऐसे में गैरसरकारी संगठनों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है कि वे लोगों में अवेयरनेस लाएं और अदालत से बाहर निपटने वाले मामलों को बाहर ही निपटाने के लिए लोगों को जागरूक करें। इसके लिए पूर्व न्यायाधीशों, पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों, वरिष्ठ वकीलों व गैरसरकारी संगठनों या सामाजिक कार्यकर्ताओं की टीम बनाई जा सकती है।
(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)
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