Wednesday, March 4, 2026
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अटल बिहारी बाजपेयी का राजनैतिक कर्मभूमि रही बलरामपुर संसदीय सीट

उस समय गोंडा में ही समाहित था बलरामपुर जनपद

गोंडा (हि.स.)। देश के तीन बार प्रधानमंत्री रह चुके अटल बिहारी बाजपेयी का जनपद की धरती राजनैतिक कर्मभूमि रही। उस समय गोंडा बलरामपुर जनपद एक था। 1957 में पहली बार जनसंघ ने उन्हें तीन जगहों से लखनऊ बलरामपुर व मथुरा से चुनाव लड़ाया दो जगह से चुनाव हारे लेकिन बलरामपुर संसदीय सीट ने उन्हें लोकसभा पहुंचा दिया।

25 दिसम्बर 1924 को ग्वालियर में जन्मे भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी एक सफल राजनीतिज्ञ होने के साथ-साथ साहित्यकार व पत्रकार के साथ-साथ एक प्रखर वक्ता थे। वाजपेयी की कविताएं पत्थरों में भी जान फूंक देती थी। उनकी कविताओं का एक छोटा सा अंश टूटे सपनों की कौन सुने सिसकी, अंतर की तीर व्यथा पलकों पर ठिठकी, हार नहीं मानूंगा, रार नई ठानूंगा, वाजपेयी के असाधारण व्यक्तित्व को देखकर उस समय के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि आने वाले दिनों में यह व्यक्ति जरूर प्रधानमंत्री बनेगा।

वर्ष 1962 में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में लखनऊ सीट से चुनाव लड़े लेकिन उन्हें पराजय का सामना करना पड़ा। इसके बाद वे राज्यसभा सदस्य चुने गए। 1967 के लोकसभा चुनाव लड़े, लेकिन जीत नहीं सके। इसके बाद 1967 में ही उपचुनाव हुआ जिसमें वाजपेयी जी विजयी हुए।

सन 1968 में वाजपेयी जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। उस समय पार्टी के साथ नानाजी देशमुख, बलराज मधोक तथा लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेता थे। पांचवी लोकसभा का चुनाव सन 1971 में हुआ जिसमें ग्वालियर संसदीय सीट से चुनाव जीतकर संसद पहुंचे। आपातकाल के बाद हुए चुनाव में 1977 और फिर 1980 के मध्यावधि चुनाव में उन्होंने नई दिल्ली संसदीय क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया।

1984 में अटलजी ने मध्य प्रदेश के ग्वालियर से लोकसभा चुनाव का पर्चा दाखिल कर दिया और उनके खिलाफ अचानक कांग्रेस ने माधवराव सिंधिया को खड़ा कर दिया, जबकि माधवराव गुना संसदीय क्षेत्र से चुनकर आते थे। सिंधिया से वाजपेयी पौने दो लाख वोटों से हार गए। कहा जाता है कि अटल बिहारी बाजपेई ने ग्वालियर सीट से चुनाव लड़ने के लिए माधवराव सिंधिया से पूछा था। तो उन्होंने वहां से चुनाव लड़ने के लिए नहीं कहा था।

लेकिन कांग्रेस की रणनीति के तहत अचानक उनका पर्चा दाखिल करा दिया गया। इस तरह वाजपेयी के पास मौका ही नहीं बचा कि दूसरी जगह से नामांकन दाखिल कर पाते। ऐसे में उन्हें सिंधिया से हार का सामना करना पड़ा। वर्ष 1991 के आम चुनाव में लखनऊ और मध्य प्रदेश की विदिशा सीट से चुनाव लड़े और दोनों ही जगह से जीते। बाद में उन्होंने विदिशा सीट छोड़ दी। वर्ष 1998- 99 के लोकसभा चुनाव में लखनऊ वा गांधीनगर लोकसभा सीट से चुनाव लड़े फिर एक बार पुनः दोनों सीटों पर विजयी हुए।

संयुक्त राष्ट्र महासंघ को पहली बार बाजपेयी ने हिंदी में किया था संबोधित

आपातकाल के बाद 1977 में हुए लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी की जीत हुई थी। मोरारजी भाई देसाई के नेतृत्व वाली सरकार में विदेश मामलों के मंत्री बने। विदेश मंत्री बनने के बाद वाजपेयी पहले ऐसे नेता थे। जिन्होंने संयुक्त राष्ट्र महासंघ को हिन्दी भाषा में संबोधित किया। जिसकी देश ही नहीं पूरी दुनिया में सराहना हुई। वर्ष 1980 में जनता पार्टी में विभाजन होने के बाद अटल जी के कई पुराने मित्र भारतीय जनता पार्टी में चले गए। भाजपा के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में उन्होंने अपना कार्यकाल पूरा किया।

1994 में कर्नाटक 1995 में गुजरात व महाराष्ट्र में पार्टी जब चुनाव जीत गई। उसके बाद पार्टी के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने वाजपेयी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया था। 1996 के लोकसभा चुनाव में भाजपा देश की सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी और वाजपेयी पहली बार प्रधानमंत्री बने। हालांकि उनकी सरकार 13 दिनों में संसद में पूर्ण बहुमत हासिल नहीं करने के चलते गिर गई।

1998 के दोबारा लोकसभा चुनाव में पार्टी को ज्यादा सीटें मिलीं और कुछ अन्य पार्टियों के सहयोग से वाजपेयी जी ने एनडीए का गठन किया और वे फिर प्रधानमंत्री बने। यह सरकार 13 महीनों तक चली। जयललिता की पार्टी ने सरकार का साथ छोड़ दिया। जिसके चलते सरकार गिर गई। 1999 में हुए लोकसभा चुनाव में भाजपा फिर से सत्ता में आई और इस बार वाजपेयीजी ने अपना कार्यकाल पूरा किया।

अटल के जन्मदिन पर होंगे, विविध कार्यक्रम

25 दिसंबर शनिवार को अटल जी के जन्मदिन पर भारतीय जनता पार्टी समेत तमाम सामाजिक संगठनों द्वारा विविध कार्यक्रम का आयोजन किया जाएगा।

महेन्द्र

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