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तलाक के बाद सम्पत्ति बचाने का नया तरीका

भारतीय व्यवसायिक घराने कंपनियों में कर रहे सख्त कानूनी प्रावधान

बिजनेस डेस्क

नई दिल्ली। भारत के बड़े व्यावसायिक घराने हाई-प्रोफाइल तलाक के मामलों में बढ़ती संख्या को देखते हुए अपने पारिवारिक समझौतों (Family Agreements) में सख्त इक्विटी ट्रांसफर क्लॉज जोड़ रहे हैं। इस कदम का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि तलाक की स्थिति में व्यवसाय की हिस्सेदारी बाहरी व्यक्तियों के हाथ में न जाए और बिजनेस पर कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़े।
शादी से पहले कड़े कानूनी नियम
हाल ही में कोलकाता के एक व्यवसायी परिवार ने मुंबई की एक प्रतिष्ठित कानूनी फर्म से संपर्क किया और अनुरोध किया कि उनके पारिवारिक समझौते में कठोर इक्विटी ट्रांसफर क्लॉज जोड़े जाएं। यह प्रक्रिया उनकी संतान के विवाह से पहले पूरी होनी थी ताकि भविष्य में संभावित तलाक की स्थिति में कंपनी की स्वामित्व संरचना में कोई बदलाव न आए। ऐसे प्रावधानों का मुख्य उद्देश्य व्यवसायिक हिस्सेदारी को परिवार के भीतर बनाए रखना है। यदि पारिवारिक सदस्य का तलाक होता है, तो यह सुनिश्चित किया जाता है कि कंपनी के शेयरों का विभाजन न हो और वे किसी बाहरी व्यक्ति के हाथ न लगें।
व्यावसायिक घराने क्यों कर रहे हैं यह बदलाव?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, कई व्यवसायिक परिवार अपने एग्रीमेंट्स में यह प्रावधान कर रहे हैं कि अगर किसी कारणवश शेयरों का हस्तांतरण करना हो, तो पहले मौजूदा शेयरधारकों या कंपनी को ही इन शेयरों को खरीदने का मौका मिले। लॉ फर्म सिरिल अमरचंद मंगलदास के पार्टनर ऋषभ श्रॉफ के मुताबिक, यदि व्यावसायिक परिवारों के पास मजबूत सुरक्षा उपाय नहीं होंगे, तो तलाक की स्थिति में शेयरधारकों की हिस्सेदारी पर कानूनी दावे किए जा सकते हैं। इससे कॉरपोरेट प्रशासन प्रभावित हो सकता है, स्वामित्व कमजोर हो सकता है, और कई पीढ़ियों से स्थापित कंपनियों की स्थिरता को खतरा हो सकता है।
संपत्तियों की सुरक्षा की रणनीति
व्यवसायी परिवार अब अपने पारिवारिक सदस्यों को विवाह-पूर्व (Prenuptial) या विवाह-पश्चात (Postnuptial) समझौते में प्रवेश करने की सलाह दे रहे हैं। इससे तलाक के मामले में वित्तीय दावों की स्पष्ट सीमाएं तय हो जाती हैं। हालांकि, भारतीय कानून में विवाह-पूर्व अनुबंधों को व्यापक रूप से मान्यता प्राप्त नहीं है। कानूनी फर्म डीएसके लीगल के आनंद देसाई के अनुसार, कोई भी प्री-नप्चुअल एग्रीमेंट जो तलाक और भरण-पोषण के मौजूदा कानूनों का उल्लंघन करता है, उसे न्यायालय में अमान्य घोषित किया जा सकता है। लेकिन कुछ कानूनी उपायों द्वारा संपत्तियों की सुरक्षा संभव हैः
ट्रस्ट संरचनाओं का निर्माणः व्यवसाय की हिस्सेदारी को ट्रस्ट के तहत रखने से स्वामित्व संरक्षित किया जा सकता है।
शेयर ट्रांसफर पर नियंत्रणः कुछ कानूनी तंत्रों के माध्यम से यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि शेयरों का हस्तांतरण बाहरी व्यक्तियों को न हो।
कॉल ऑप्शन्स : इससे परिवार के सदस्यों को शेयरों की पहली खरीद का अधिकार मिलता है। सिर्फ संपत्ति की सुरक्षा ही नहीं, बल्कि प्रमोटर अब अपने बिजनेस में वोटिंग अधिकारों को भी मजबूत कर रहे हैं। वे अपने गवर्नेंस फ्रेमवर्क में ठनलइंबा प्रावधानों को शामिल कर रहे हैं, जिससे उन्हें उन शेयरों को पुनः खरीदने की अनुमति मिलती है, जो तलाक के बाद परिवार के नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं।
क्या भारतीय कानून इस मॉडल को स्वीकार करेगा?
विकसित देशों में प्री-नप्चुअल एग्रीमेंट्स आमतौर पर वैध माने जाते हैं, लेकिन भारतीय कानून में अभी यह स्पष्ट रूप से मान्यता प्राप्त नहीं है। हालांकि, व्यवसायिक घरानों द्वारा अपनाए जा रहे ट्रस्ट मॉडल, इक्विटी ट्रांसफर प्रतिबंध और मजबूत गवर्नेंस उपाय व्यावसायिक स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

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