UP : शीशा हो या दिल, टूट जाता है!

प्रादेशिक डेस्क

गोरखपुर। केसरी कोई साधारण बाघ नहीं था। पीलीभीत के जंगलों से लेकर गोरखपुर चिड़ियाघर तक का उसका सफर उसकी ताकत और तन्हाई की दास्तां था। चौदह लोगों को अपना शिकार बनाने वाला यह आदमखोर बाघ आखिरकार 23 सितंबर 2024 को ट्रंक्युलाइज होकर पिजड़े में कैद हुआ। मुख्यमंत्री ने उसे ‘केसरी’ नाम दिया, मानो उसकी शान और शक्ति को सम्मान मिला हो। लेकिन किसे पता था कि यह शेर, जिसके कदमों से जंगल कांपता था, एक दिन अपने ही दिल की चोट से हार जाएगा।
केसरी का बाड़ा गोरखपुर चिड़ियाघर में तैयार हुआ। उसके ठीक बगल में थी गीता, एक सफेद बाघिन, जिसकी मासूम आंखों और शांत स्वभाव ने केसरी को पहली बार अपनेपन का एहसास दिलाया। दोनों के बीच एक अनकही दोस्ती पनपने लगी। बाड़े की दीवारों के बीच से कभी वो एक-दूसरे को देखते, तो कभी गीता की हल्की गुर्राहट केसरी को सुकून देती। शीशे-सा नाजुक यह रिश्ता बन गया था, पर टूटने की आहट अभी दूर थी। लेकिन कहते हैं न, हर खूबसूरत चीज का अंत लिखा होता है। कुछ दिनों बाद गीता की नजरें बदलने लगीं। उसके दूसरी ओर के क्रॉल में रहने वाला बाघ ‘अमर’ उसकी दुनिया में दाखिल हो गया। गीता अब अमर की ओर झुकने लगी, और केसरी की नजरों के सामने यह सब होता रहा। वह उग्र हो उठा। शनिवार को उसने अपने पिजड़े से निकलने की कोशिश में खुद को घायल कर लिया। बार-बार दीवारों से टकराता रहा, मानो कह रहा हो “नाजुक सा ये मन मेरा, क्यों सह न सका ये गम मेरा?”

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रविवार की सुबह, इलाज के दौरान केसरी ने दम तोड़ दिया। पोस्टमार्टम में पता चला कि उसके दिमाग में सूजन थी, पानी भर गया था। डॉक्टरों ने कहा, शायद यह तनाव और चोट का नतीजा था। लेकिन जो बात रिपोर्ट में नहीं लिखी गई, वह थी उसके टूटे हुए दिल की कहानी। गीता की बेवफाई, उसकी तन्हाई, और उसका गुस्साकृसब मिलकर उसे ले डूबे। जांच के लिए विसरा बरेली भेजा गया। दो टीमें गठित हुईं। पर सवाल यह है कि क्या कोई जांच उस दर्द को समझ पाएगी, जो शीशे-सा टूट गया? केसरी की कहानी बस इतनी सी थीकृएक शेर, जिसका दिल भी इंसानों की तरह नाजुक था, और आखिर में टूट गया।
“शीशा हो या दिल हो, आखिर टूट जाता है,
कोई चाहे कितना रोके, ये बिखर जाता है…”
यह कहानी गाने की भावनाओं को केसरी के जीवन से जोड़ती है, जिसमें प्यार, बेवफाई और टूटन का दर्द एक जानवर के जरिए भी महसूस होता है।

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