Wednesday, April 1, 2026
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हत्यारा और उसका अदना शिकार : एक तुलना!

के. विक्रम राव

इजराइल की नवगठित संसद (नेस्सेट) के 25वें समारोह में गत मंगलवार को येरुशलम में एक चौदह वर्षीय बालक विशिष्ट अतिथि था। नाम था मोशे होल्सबर्ग। वह मात्र दो वर्ष का था, जब हत्यारे कसाब और इस्लामी पाकिस्तान के लश्कर-ए-तैयब के आंतकियों ने मुंबई तथा अन्य इलाकों पर गोलीबारी की थी। इसमें 166 लोग भून दिये गए थे। मोशे के पिता राबी (पुजारी) गाब्रियल होल्सबर्ग तथा माँ रिकवा भी मार डाले गए थे। वे यहूदी धर्मस्थल छाबाद भवन, नारीमन मार्ग पर थे। आया सैंडर्स ने शिशु मोशे को हमलावरों से बचा लिया था। नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतनयाहु इस संसदीय जलवे मंे प्रमुख थे। अगले सप्ताह (शनिवार, 26 नवंबर 2022) के दिन मुंबई पर इस पाकिस्तानी लश्कर द्वारा हमले की चौदहवीं सालगिरह है। हमले के समय शिशु मोशे इस दिन नारीमन मार्ग पर स्थित छाबाद भवन में था। माता-पिता के साथ। वह यहूदियों का उपासना स्थल है। परसों मोशे ने येरूशलम के संसदीय समारोह में यहूदी धर्मग्रंथ से छंद 125 को पढ़ा। इसमें इजराइल की सुरक्षा तथा क्षेम की प्रार्थना है। उसने संयुक्त राष्ट्र संघ के आतंक-विरोधी समिति को भी संबोधित किया था। नोबेल विजेता पठान छात्रा मलाला युसूफ जई की भांति मोशे भी छात्रावस्था में ही आतंक का शिकार रहा। इस्लामी दहशतगर्दों का। अजमल कसाब के हत्यारे साथियों ने होटल ताज और छाबाद भवन को भून डाला था। लश्कर कश्मीर को चाहता है। उस दौर में कांग्रेसी प्रधानमंत्री थे सरदार मनमोहन सिंह। गृहमंत्री थे शिवराज विश्वनाथ पाटिल जिनके बारे में मशहूर था कि हर घंटे बाद वे नया सूट धारण करते थे। टीवी एंकरों की खोज रही। मनमोहन-सोनिया राज में इस क्रूरतम आतंकी घटना का दोषी सरगना हाफिज अभी तक दंडित नहीं हुआ। कसाब को फांसी जरूर मिली। पर इसके वकीलों में राम जेठमलानी का नाम भी था। मियां फरहान शाह तथा मियां अमीन सोलकर भी थे। उन्हें मुंबई उच्च न्यायालय की विधि सेवा समिति के अध्यक्ष कार्यकारी न्यायधीश जय नारायण पटेल ने नामित किया था। कसाब पर मुकदमा चार वर्षों तक चला था। अंततः सर्वाेच्च न्यायालय ने मृत्युदंड का आदेश दिया था। यह मुकदमा आर्थर रोड जेल के अंदर चला। बाकी आतंकी तो पुलिस की जवाबी गोली से मारे गए थे। केवल कसाब जीवित पकड़ा गया था। उस पर जिला कोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक चार वर्षों तक मुकदमा चला था। इसका विवरण मीडिया में विस्तार से प्रचारित और प्रसारित हुआ था। अंततः मुकदमे की पूरी दास्तां की खास तिथियाँ 26 नवंबर 2008 से 2011 तक थी। अजमल कसाब और नौ आतंकवादियों ने मुंबई पर हमला किया। उसमे 166 लोग मारे गए थे, 27 नवंबर 2008: अजमल कसाब गिरफ्तार हुआ था। उसने 30 नवंबर 2008 पुलिस हिरासत में गुनाह कबूल किया। वह 312 मामलों में आरोपी बनाया गया। विशेषज्ञों की राय पर अदालत का फैसला था कि कसाब नाबालिग नहीं था। हाफिज सईद, जकी-उर-रहमान लखवी समेत 22 लोगों के खिलाफ 23 जून 2009 गैर-जमानती वारंट जारी हुआ। कोर्ट ने कसाब को दोषी ठहराया, सबाउद्दीन अहमद और फहीम अंसारी आरोपों से बरी और 6 मई, 2010: कसाब को विशेष अदालत ने मौत की सजा सुनाई।
सरकारी वकील निकम ने अदालत को बताया था (19 नवंबर 2010) कि 26/11 के हमलावर देश में मुसलमानों के लिए अलग राज्य चाहते थे। इसी बीच कसाब के वकील अमील सोलकर ने निचली अदालत की कार्यवाही को गलत ठहराते हुए दोबारा ट्रायल की मांग की। उसने तर्क दिया कि कसाब के खिलाफ “देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने के आरोप नहीं बनते। सोलकर ने फुटेज में दिखी तस्वीरों को गलत बताया। उसका कहना था कि पुलिस ने गिरगाम चौपाटी में 26 नवंबर 2008 को झूठी मुठभेड़ का नाटक करके कसाब को फंसाया है। साथ ही मौके पर कसाब की मौजूदगी से इंकार करते हुए उसकी गिरफ्तारी को गलत बताया। फिर (29 जुलाई 2011) ने फांसी की सज़ा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की। सुप्रीम कोर्ट ने फांसी की सजा पर रोक लगाई। सुनवाई आगे चली। कसाब का पक्ष रखने के लिए वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन को अदालत का मित्र यानी एमिकस क्यूरी नियुक्त किया गया। अपील पर कोर्ट ने सुनवाई पूरी की और फैसला सुरक्षित रखा। फांसी की सज़ा को सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा। राष्ट्रपति के सामने दया के लिए भेजी गई कसाब की अर्ज़ी गृह मंत्रालय ने खारिज की और अपनी सिफारिश राष्ट्रपति को भेजी। राष्ट्रपति ने दया याचिका निरस्त की। केंद्रीय गृहमंत्री ने फाइल पर दस्तखत के बाद कसाब को सुबह 7.30 बजे (21 नवंबर 2012) फांसी दी गई। क्रूर परिहास यह था कि आतंकी अजमल आमिर कसाब जब खुद मौत के सामने खड़ा हुआ तो घबरा गया था। जेल वाले उससे अंतिम इच्छा पूछ रहे थे और वह बार-बार यही दोहरा रहा था कि ‘साहब, एक बार माफ कर दो। अल्लाह कसम, ऐसी गलती दोबारा नहीं होगी।’ जब उसके गले में फंदा डला तो जोर से बोला ‘अल्लाह मुझे माफ करे।’ अर्थात एक जाना माना अपराध था। पर चार साल तक इस्लामी कसाब को भोजन पानी भारतीय करदाता के धन से मुफ्त मिला। तो तुलना कीजिये इस्लामी कसाब की इस यहूदी बालक मोशे से! किसको समुचित न्याय मिला? और कितना था?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं आइएफडब्लूजे के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)

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