सरकार ने नहीं, मंदिर निर्माण का मार्ग पक्षकारों, अधिवक्ताओं और न्यायाधीशों ने किया प्रशस्त : स्वामी स्वरूपानंद

-श्रीराम मंदिर की आधारशिला रखे जाने के बाद भी शंकराचार्य स्वरूपानंद की तल्खी नहीं हुई कम

-बोले, सरकार ने तो पांच एकड़ भूमि अयोध्या में नई मस्जिद बनाने के लिए सौंप दिया


वाराणसी(एजेंसी)। रामनगरी अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण के लिए बुधवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हाथों शुभ मुर्हूत में आधारशिला रखे जाने के बाद भी ज्योतिष एवं द्वारका-शारदापीठ के शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की तल्खी कम नहीं हुई है। 
 उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि अयोध्या में मंदिर निर्माण का मार्ग पक्षकारों, अधिवक्ताओं और न्यायाधीशों ने प्रशस्त किया न की सरकार ने। श्रीराम जन्मभूमि पर मंदिर निर्माण का कार्य तो इलाहाबाद उच्च न्यायालय एवं सर्वोच्च न्यायालय के दिए गए निर्णयों ने प्रशस्त किया है, यह सर्वविदित तथ्य है।
 शंकराचार्य ने बयान जारी कर कहा कि जो व्यक्ति सरकार में बैठे हैं, उनकी मातृ संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा उनकी भगिनी संस्था विश्व हिंदू परिषद् के सदस्यों ने अयोध्या में एक और नई मस्जिद के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया है। 
 उन्होंने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित सुप्रीम कोर्ट के कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति  कलीफुल्ला (सेवानिवृत्त), धर्मगुरु श्रीश्री रविशंकर, वरिष्ठ अधिवक्ता श्रीराम पंचू की मध्यस्थता समिति के प्रयासों के फलस्वरूप सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड हम कुछ हिंदु पक्षकार धर्माचार्यों में विश्वास करते हुए विवादास्पद भूमि को हम लोगों को दे देने के निमित्त 15 अक्टूबर 2019 को एक समझौता पत्र पर हस्ताक्षर कर दिया था। उस समझौते का मूल आशय यह था कि सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड बिना किसी भूमि को लिए श्रीराम जन्मभूमि कि विवादास्पद भूमि हम हिंदू धर्माचार्यों को सौंप रहा है। न्यायालय से उनकी यह अपेक्षा होगी की वह भारत सरकार को यह निर्देश दें कि अयोध्या में जो कुछ पुरानी जीर्ण-शीर्ण मस्जिदें हैं, उनकी मरम्मत करवा दें और पूजा स्थल अधिनियम का भविष्य में अनुपालन सुनिश्चित करें। 
 उन्होंने बताया कि समझौते में यह भी था कि पुरातत्व विभाग ने जिन मस्जिदों में नमाज पढ़ना निषिद्ध कर रखा है, उसके लिए तीन सदस्यीय एक समिति बना दी जाए। जिसमें एक अवकाश प्राप्त हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति हों, भारतीय पुरातत्व विभाग के एक निदेशक स्तर के वरिष्ठ अधिकारी हों और एक विशेषज्ञ विद्वान हो, इस समिति के सदस्य जिन मस्जिदों को नमाज पढ़ने योग्य बतावे उनमें मुसलमानों को नमाज पढ़ने दिया जाए। 
 इस समझौते पर हिंदुओं की ओर से मेरी संस्था अखिल भारतीय श्री राम जन्मभूमि पुनरुद्धार समिति के उपाध्यक्ष स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती, अयोध्या के महंत धर्मदास, निर्मोही अखाड़ा अनी के महंत दिनेन्द्रदास, हिंदू महासभा के अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणि आदि ने हिंदू पक्ष की ओर से इस समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। परंतु संघ परिवार के लोगों ने इस समझौते को मानने से इनकार कर दिया। जिसके कारण सुप्रीमकोर्ट को निर्णय देना पड़ा। 
  उन्होंने कहा कि सुप्रीमकोर्ट के निर्णय में संघ परिवार के सदस्यों के द्वारा 1949 में विवादास्पद ढांचे के अंदर मूर्ति रखने तथा 1992 में उसको धराशाई करने को गैर कानूनी अपकृत्य करार देते हुए कड़े शब्दों में घोर निंदा की गई है। उन्होंने कहा कि इनके अपकृत्यों से होने वाली मुसलमानों की आहत भावना पर मरहम लगाने के उद्देश्य से सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकारों को निर्देश दिया। निर्देश था कि मुसलमानों को मस्जिद बनाने के लिए पांच एकड़ भूमि अयोध्या में ही दी जाए। सरकार ने भी बिना पुनरीक्षण याचिका या शोधनी याचिका  दायर किए ही पांच एकड़ भूमि अयोध्या में नई मस्जिद बनाने के लिए सौंप दिया है। 
-फिर मुहूर्त को लेकर शंकराचार्य ने सवाल उठाया
शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने शिलान्यास के बाद भी मुहूर्त को लेकर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि भवन निर्माण भाद्रपद मास में निषिद्ध है, इस महीने में मंदिर निर्माण आरंभ करना न केवल शास्त्र विरुद्ध कार्य है, बल्कि न्यायालय द्वारा दी गई विधि व्यवस्था के भी विरुद्ध है। 
-स्वयं को शास्त्र से ऊपर मान रहे
शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने कहा कि स्वयं को ही शास्त्र से ऊपर भगवान मानकर धर्म गुरुओं का अपमान करने का दुष्परिणाम हमें पूर्वकाल के इतिहास से प्राप्त होता है, उससे सबको सीख लेनी चाहिए। एक पुरानी कथा का भी उन्होंने उल्लेख किया। 

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