विचार : हाईकोर्ट की सख्ती सही

(लेखक\सिद्वार्थ शंकर)
देश में कोरोना वायरस की दूसरी लहर से हाहाकार मचा हुआ है। मद्रास हाईकोर्ट ने सोमवार को संक्रमण के प्रसार के लिए चुनाव आयोग जिम्मेदार ठहराते हुए जमकर फटकार लगाई। हाईकोर्ट ने कहा कोरोना की दूसरी लहर के लिए किसी एक को जिम्मेदार ठहराना हो, तो अकेले चुनाव आयोग जिम्मेदार है। कोर्ट ने कहा कि यह जानते हुए भी कि कोरोना संक्रमण अभी है बावजूद चुनावी रैलियों पर रोक नहीं लगाई। इसके लिए चुनाव आयोग के अधिकारियों पर हत्या का मामला चलाया जाना चाहिए। साथ ही आयोग से कहा कि दो मई की तैयारियां पहले से बता दें वरना मतगणना रोक दी जाएगी। हाईकोर्ट की यह सख्ती गलत नहीं है। आज चुनाव वाले राज्यों में कोरोना का क्या हाल है, छिपा नहीं है। एक केरल को छोड़कर चारों राज्यों पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, पुडुचेरी और असम में संक्रमितों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। चुनावी राज्य बंगाल में कोरोना कहर ढा रहा है। बंगाल की राजधानी कोलकाता में टेस्ट कराने वाला हर दूसरा व्यक्ति कोरोना पॉजिटिव मिल रहा है। वहीं, राज्य की बात करें, तो सैंपल देने वाले हर 4 में से एक व्यक्ति जांच के दौरान संक्रमित मिल रहा है। राज्य में एक अप्रैल को 25,766 सैंपल की जांच के दौरान केवल 1274 सैंपल पॉजिटिव मिले थे तब पॉजिटिविटी रेट 4.9 फीसदी था। शनिवार को 55,060 सैंपल जांचे गए जिनमें 14,281 पॉजिटिव मिले, संक्रमण की यह दर 25.9 फीसदी है।
इस साल फरवरी की शुरुआत में लोगों ने इस महामारी को हल्के में लेना शुरू कर दिया था क्योंकि रोजाना नए मामलों की संख्या काफी घट गई थी। सभी राहत की सांस ले रहे थे। एक्टिव मामलों की संख्या बहुत कम रह गई थी। फिर, अचानक कोरोना की दूसरी लहर ने पांव पसारना शुरू कर दिया। वर्तमान हालात को देखते हुए यह भी कहा जा सकता है कि एक देश के तौर पर हम पिछले एक साल के अनुभव से शायद बहुत अधिक नहीं सीख पाए। यदि सीखा होता तो आज इस तरह की विषम परिस्थिति पैदा नहीं हुई होती। कोरोना के नए वैरिएंट, महामारी से बचाव के उपायों के प्रति लापरवाही और चुनाव दूसरी लहर के मुख्य कारण हैं। हालांकि, चार चरण बीत जाने के बाद बंगाल में सख्ती को लेकर चुनाव आयोग सामने आया और उसने राजनीतिक दलों को फटकार लगाई। हैरानी इस बात की है कि पहले निर्वाचन आयोग को कोरोना नियमों की सुध क्यों नहीं आई। जब पांचों राज्यों में चुनाव प्रक्रिया शुरू हुई थी तभी कोरोना के मामले बढऩे शुरू हो गए थे और कई राज्यों में यह चिंताजनक स्तर पर पहुंच चुका था। मगर राजनीतिक दल बढ़-चढ़ कर रैलियों में अपना शक्ति प्रदर्शन कर रहे थे। लाखों की भीड़ जुटाने में जुटे थे। नेता सड़कों पर जुलूस निकालने से लेकर मोहल्लों में घर-घर जाकर संपर्क बना रहे थे। साफ देखा जा रहा था कि उनमें से ज्यादातर न तो ठीक से नाक-मुंह ढंक रहे थे और न ही उचित दूरी का पालन कर रहे थे। ऐसा नहीं माना जा सकता कि उस वक्त निर्वाचन आयोग को चुनाव प्रचार में बरती जा रही मनमानी नजर नहीं आ रही थी। सोशल मीडिया और मुख्यधारा मीडिया के कुछ मंचों पर भी कोरोना के बढ़ते मामलों के मद्देनजर चुनाव प्रचार में कोरोना नियमों का पालन न किए जाने को लेकर काफी चिंता जाहिर की जा रही थी।
कई लोग बार-बार निर्वाचन आयोग की चुप्पी पर अंगुलियां उठा रहे थे। असम और बंगाल में चुनाव प्रचार के दौरान राजनीतिक दलों की मनमानियां को लेकर खूब आपत्तियां दर्ज कराई गईं और सबमें निर्वाचन आयोग की भूमिका लगभग निष्क्रिय बनी रही उससे उसकी मंशा पर जितने सवाल उठे, शायद पहले कभी नहीं उठे। कोरोना नियमों को लेकर उसकी चुप्पी सचमुच हैरान करने वाली थी। इस दौरान जब कई राज्यों में रात का कफ्र्यू और सप्ताहांत की बंदी लागू की गई, अनेक जगहों पर कोरोना नियमों का पालन न करने वालों के खिलाफ पुलिस की सख्ती के कई उदाहरण सामने आए, जिसमें ठीक से मास्क न पहनने पर कुछ लोगों को बेरहमी से पीटने तक की तस्वीरें खूब प्रसारित हुईं। पर निर्वाचन आयोग चुनाव प्रचार में कोरोना नियमों के उल्लंघन को लेकर चुप्पी साधे रहा।

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