बैल बन्धु

ज्ञान सिंह

आप सभी ने प्रेमचंद की कहानी ‘दो बैलों की जोड़ी‘ जरूर पढ़ी होगी, आज मैं आपको दो दोस्तों की कहानी सुनाता हूँ। बात उन दिनों की है जब मैं यूनिवर्सिटी में पढ़ता था। हमारे हास्टल के रूम नंबर 24 में यह दोनों दोस्त रहते थे। एक का नाम था आत्माराम और दूसरे का पवन कुमार झमेले। आत्माराम की ख़ासियत यह थी कि वह अपने शरीर से संलग्न अंगों को उतना ही हिलाता डुलाता था जिससे अनिवार्य दैनिक कार्य सम्पन्न हो जाएं। शेष समय वह निद्रासुख लेने व आराम करने पर बिताता था। इसीलिये उसके नाम का संधि विच्छेद लोगों द्वारा आत्म$आराम सृजित किया गया था। जिस अवधि में वह जागृत अवस्था में रहता था, वह शरीर के शीर्ष भाग में स्थित अपने अंग का उपयोग अन्य लोगों को परेशान करने के तरीक़े ईजाद करने में लगाता था। पवन कुमार झमेले के बारे में कुछ खोजियों ने बड़ी मेहनत से पता लगाया कि पवन कुमार के नाम के साथ मूल में झमेले नहीं था और कालांतर में उसके क्रिया कलापों के कारण उसे यह अलंकरण प्राप्त हुआ था। कहने का तात्पर्य यह है कि मूल नाम केवल ‘पवन कुमार’ था, बाद में ‘झमेले‘ की पूछ लगाई गई। आकार प्रकार से तो यह दोनों मनुष्य योनि के प्राणी ही माने जा सकते थे, पर इनके स्वभाव, हाव-भाव, तौर-तरीक़ों और हरकतों से सहज ही इन्हें बृषभ प्रजाति का होने का भ्रम उत्पन्न हो जाता था। इसीलिये सभी लोग इन्हें बैल बन्धु कहकर बुलाया करते थे। चुहल में कुछ लोग उन्हें हीरा मोती भी कह देते थे और यह कहानी बना दी गई थी कि प्रेमचन्द वाले हीरा मोती मरणोपरान्त मानवीय अवतार में प्रकट हो गये हैं। इन बैल बन्धुओं की ख़ास बात यह थी कि पढ़ाई लिखाई को छोड़कर वह हर चीज़ में माहिर थे। किसी से भी बेबात पंगा लेने के मौक़े यह खोजते रहते थे और अगर दो तीन दिन सुकून से बीत गये तो यह लोग डिप्रेशन के शिकार हो जाते थे। इनका प्रिय शग़ल टप्पेबाजी था। किसी की कोई भी चीज यह पलक झपकते उडा़ देते थे और अगले को भनक तक नहीं लग पाती थी। बगल वाला अपनी तौलिया ढूँढ रहा होता था और बैल बन्धुओं में कोई एक अगले दिन उसे कमर में लपेटे हुये बाथरूम की ओर जाते हुए आसानी से दिखाई दे जाता था, पर किसी की क्या मजाल कि वह इस वस्त्र पर अपना दावा ठोक सके। दोनों दोस्त सींग उठाये हुये पिल पड़ने को हमेशा तैयार रहते थे। एक आध बार कुछ दुःसाहसी क़िस्म के लोगों द्वारा अपनी पहचान छिपाने का उचित इंतज़ाम करते हुए बोरा ओढ़ा कर इन बैल बन्धुओं की विधिवत पूजा अर्चना भी की गई लेकिन उनके यह साहसिक कृत्य बैल बन्धुओं की ख़ुराफ़ाती आदतों को रोक पाने में नाकामयाब साबित हुए।

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यह तो अपनी शिक्षा व्यवस्था का चमत्कार ही समझिये कि बैल बन्धुओं को उत्तीर्ण करते हुए डिग्री भी प्रदान कर दी गई जिससे यह भली भाँति प्रमाणित हो गया कि हमारे विश्वविद्यालय बिना भेदभाव के निस्पृह होकर विद्यादान के अपने दायित्व का निर्वहन करते हैं भले ही कोई उसे ग्रहण करे या न करे। आगे चलकर यह भी साबित हो गया कि विद्या का योग्यता से कोई सीधा तालुक्क नहीं है, जब बैल बन्धु ऊपर वर्णित असंख्य गुणों के बावजूद अच्छी ख़ासी राजपत्रित सरकारी नौकरी पाने में भी कामयाब हो गये। यह तो आप सब जानते ही हैं कि एक बार सरकारी नौकरी हाथ लगने के बाद तो असली समाजवाद आ जाता है और गधों व घोड़ों को समान दृष्टि से देखा और आँका जाता है। कहने का मतलब यह है कुर्सी पर बैठे उस विशिष्ट जन्तु को समान आदर प्राप्त होता है, भले ही वह घोड़ा हो या फिर गधा। उल्टे कभी-कभी गधा ज़्यादा सफल और सम्मानित हो जाता है और घोड़ों को हाँकता है। सुनने में आया है कि आजकल हमारे यह बैल बन्धु रिटायर होने के बाद शहर लखनऊ में ही सुख पूर्वक ज़िन्दगी बिता रहे हैं। दोनों को वाट्सआप और फ़ेसबुक का शौक़ ज़ोरों से चर्राया हुआ है। उनमें से सीनियर आत्माराम अब पूर्णतः राम मय हो गये हैं और धार्मिक प्रवचन नाम की बीमारी से ग्रस्त होकर तरह-तरह के प्रवचन अन्य जगहों से टीप कर डालते रहते हैं। हो सकता है कि वह आशाराम टाइप बाबाओं की शोहरत और कामयाबी से प्रेरित हो गये हों। जूनियर श्री झमेले लोगों की हेल्थ सुधारने पर तुल गये हैं और भाँति-भाँति के स्वास्थ्य वर्धक नुस्ख़े बताते रहते हैं। यह बात अलग है कि झमेले को सौ मीटर चलने के बाद खुद कहीं बैठ कर सुस्ताने की ज़रूरत पड़ जाती है और खुद दिन में सौ ग्राम गोलियाँ फाँकते हैं। पर इन सब बातों से बेफिक्र वह मित्र लोगों की हेल्थ सुधारने का बीड़ा उठाये रहते हैं। मित्र लोग इन दोनों की हौसला अफ़जाई करते रहते हैं और बिना पढ़े ही ‘हाथ जोड़ कर व फूल चिपका कर‘ अपनी ज़िम्मेदारी की इति श्री कर देते हैं। फ़ेसबुक और वाट्सआप की ख़ासियत यह है कि कोई भी चोरी की सामग्री का हेर फेर कर खुद को बड़ा विद्वान और लेखक बना सकता है। यह बात अलग है कि अन्य लोग ऐसे लोगों की विद्वता से बहुत हलाकान और परेशान रहते हैं पर शिष्टता बस वह अपने मस्तिष्क का न्यूनतम उपयोग करते हैं तथा विकल्प के रूप में अँगूठा, फूल, जुड़े हाथ आदि प्रतीकों से काम चला लेते हैं। अब मैं बैल बन्धुओं की इस कथा को यहीं समाप्त करता हूँ। आप सभी से निवेदन है कि बाहर भीषण गर्मी पड़ रही है। अतः अपना ख्याल रखें और सिर में अँगोछा लपेट कर ही बाहर निकले क्योंकि भूसा ज्वलनशील होता है और शरीर को क्षति पहुँचा सकता है।

(लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा के यूपी कैडर के अधिकारी रहे हैं।)

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महत्वपूर्ण सूचना

जिले के युवा जिलाधिकारी डा. उज्ज्वल कुमार और नवागत सीडीओ गौरव कुमार की अगुवाई में जिले में बड़े बदलाव की कोशिशें शुरू कर दी गई हैं। यह दोनों युवा अधिकारी Transforming Gonda के नारे के साथ जिले के चाल, चरित्र और चेहरे में आमूल चूल परिवर्तन लाना चाहते हैं। जिले के विकास के लिए शुरू की गई अनेक महत्वपूर्ण योजनाएं इसी दिशा में किए जा रहे कोशिशों का परिणाम है। आगामी 21 जून को जब पूरा विश्व योग दिवस मना रहा होगा, तब योग के प्रणेता महर्षि पतंजलि की जन्म स्थली पर इन दोनों अधिकारियों ने कुछ विशेष करने का निर्णय लिया है। लक्ष्य है कि जिले की बड़ी आबादी को उस दिन योग से जोड़ा जाय। इस क्रम में अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस को सफल बनाने के लिए जनपद के ज्यादा से ज्यादा लोगों को जोड़ने के लिए YOGA DAY GONDA नाम से एक फेसबुक पेज बनाया गया है। जिला प्रशासन की तरफ से जरूरी सूचनाएं, गतिविधियों आदि की जानकारी व फोटोग्राफ इत्यादि इसी पेज पर शेयर किए जाएंगे। कृपया आप इसका महत्वपूर्ण हिस्सा बनते हुए इससे जुड़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके पेज को LIKE करें तथा अपने परिचितों को भी ऐसा करने के लिए प्रेरित करें।

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जानकी शरण द्विवेदी
सम्पादक
www.hindustandailynews.com

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