नई दिल्ली : गोमूत्र और गोबर पर टिप्पणी के लिए किसी को जेल में डालना उसके मौलिक अधिकार का हनन : सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली । गोमूत्र और गोबर से कोरोना के इलाज से संबंधित नेताओं के बयान की आलोचना करने के बाद सामाजिक कार्यकर्ता लीकोम्बम एरेंद्रों को एनएसए के तहत हिरासत में लिए जाने की सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाली पीठ ने उनके मौलिक अधिकारों का हनन बताया है। पीठ ने कहा कि एरेंडो को जेल में रखना उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है।
सुप्रीम कोर्ट में सामाजिक कार्यकर्ता के पिता की ओर से अर्जी दाखिल कर रिहाई की गुहार लगाई। पिता की ओर से अर्जी दाखिल कर कहा गया है कि उनके बेटे के फेसबुक पर 13 को पोस्ट डाली गई थी कि गाय के गोबर और गोमूत्र कोरोना का इलाज नहीं है। बाद में पोस्ट को हटा लिया गया था।
याचिकाकर्ता ने कहा भाजपा नेताओं की आलोचना करने के लिए ही सामाजिक कार्यकर्ता को सजा दी जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि उन्हें एक रात भी जेल में नहीं रखा जा सकता। सामाजिक कार्यकर्ता को लगातार हिरासत में रखना उनके मौलिक अधिकार का हनन होगा। .ब अनुच्छेद-21 के तहत मिले जीवन के अधिकार का भी हनन होगा। देश के कई हिस्सों में एनएसए के तहत गिरफ्तारी पहले भी सवाल उठे हैं। सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद एक बार फिर इसको लेकर सवाल खड़े हुए कि आखिर किन मामलों में इन्हें लगाया जाना चाहिए। आखिर एनएसए है क्या और किस प्रकार के मामलों में इसे लगाया जा सकता है। नेशनल सिक्युरिटी एक्ट (एनएसए) जिसे राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (रासुका) भी कहा जाता है। यह कानून राष्ट्रीय सुरक्षा में बाधा डालने वाले लोगों पर लगाम लगाने के लिए है।
सरकार को जब ऐसा लगता है कि कोई व्यक्ति कानून व्यवस्था को सही ढंग से चलाने में बाधा डाल रहा है, तो उसे इस कानून के तहत गिरफ्तार किया जा सकता है। इंदिरा गांधी की सरकार के कार्यकाल के दौरान 23 सितंबर 1980 को नेशनल सिक्युरिटी एक्ट (एनएसए) अस्तित्व में आया था। यह कानून केंद्र और राज्य सरकार को संदिग्ध व्यक्ति को हिरासत में लेने की शक्ति प्रदान करता है। देश की सुरक्षा को यह कानून और मजबूत बनाता है।
सीपीसी 1973 के तहत जिस व्यक्ति के खिलाफ यह आदेश जारी किया जाता है, उसे देश के किसी भी हिस्से में गिरफ्तार किया जा सकता है। इस कानून के तहत किसी संदिग्ध व्यक्ति को बिना आरोप तय किए 10 दिनों के लिए हिरासत में रखा जा सकता है। राज्य सरकार को यह बताना होगा कि एनएसए के तहत उसे पकड़ा गया है। राष्ट्रीय सुरक्षा कानून या फिर रासुका के तहत ऐसे व्यक्ति को महीनों तक हिरासत में रखने का अधिकार देता है, जिससे प्रशासन को कानून व्यवस्था के लिए खतरा महसूस हो। कानून के तहत उसे तीन महीने और आवश्यकतानुसार गिरफ्तारी तीन-तीन महीने के लिए बढ़ाई जा सकती है।

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