अनेक अनुत्तरित सवालों का जवाब है ‘हस्तिनापुर एक्सटेंशन’

हेमंत शर्मा

मित्रवर उमेश प्रसाद सिंह का नया उपन्यास आया है ‘हस्तिनापुर एक्सटेंशन’। ‘इंद्रप्रस्थ एक्सटेंशन’ दिल्ली में है और ‘हस्तिनापुर एक्सटेंशन’ उन्होंने उत्तर प्रदेश के चंदौली में गढ़ दिया। उपन्यास का आधार महाभारत है। महाभारत की मूल कथा के अलावा उसमे प्रकरी कथाएं अनंत है। महाभारत सतत है। आज भी जारी है जितनी वह व्यक्ति की कथा है, उतनी ही समूह की। यह महाभारत नए-नए आयामों में हम सबके भीतर चलता रहता है। उमेश ने वर्तमान संदर्भों में महाभारत के अनुरत्तित सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश की है। इसमें वे काफ़ी हद तक कामयाब रहे हैं। इस उपन्यास के पात्र भले महाभारत के हैं, पर वे लगते हमारे बीच के हैं। इस औपन्यासिक आख्यान के केंद्र में भीष्म पितामह हैं। और सामने है उमेश सिंह का प्रश्नाकुल मन। वे अपने हर सवाल का जवाब भीष्म के जरिए ढूंढते हैं। वे महाभारत के पात्रों का तनाव, संत्रास, अवसाद, संग्राम, पश्चाताप और उनके अंतर्द्वंदों को रेखाकिंत करते हैं। सवाल जवाब के जरिए महाभारत के रूपकों, प्रतिमानों को आधुनिक संदर्भ में उतारते हैं। इतिहास पुराण का पुनर्लेखन मुश्किल काम है। इतिहास की अनिवार्यता को वर्तमान की प्रासंगिकता के साथ प्रस्तुत करना ही इस उपन्यास की सबसे बड़ी खूबसूरती है। उमेश इस पर खरे उतरे हैं।तर्क वितर्क के साथ उनके पास समाधान भी है।
ऋषि पराशर और सत्यवती से जन्मे व्यास उपन्यास की शुरूआत में ही इसके अंत का संकेत देते हैं। मानव मन की विचित्रताओं के आगे क्या ऋषि मुनि, क्या आम व्यक्ति, सभी नतमस्तक हो जाते हैं। सत्यवती एक बार फिर से इतिहास के दोराहे पर होती है जब महाराज शांतनु उसके आगे याचक की मुद्रा में खड़े होते हैं। सत्यवती अपना अधिकार मांगती है। विवश शांतनु अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए कातर भाव से देवव्रत के आगे खड़े होते हैं। इतिहास की यही कातरता और आदर्शों की विवशता भीष्म को जन्म देती है। भीष्म इस उपन्यास के नायक हैं। हालांकि उनका नायकत्व परिस्थितियों के चक्रव्यूह और अनुभव के कसैलेपन के बीच कई बार नकारात्मकता की परिधि तोड़ता नज़र आता है मगर वे आचरण के इस अतिक्रमण में मानव जाति के लिए कोई न कोई संदेश देने की कोशिश करते हैं। उमेश जी ने इस उपन्यास के जरिए महाभारत के एतिहासिक चरित्रों के जीवन के उन पहलुओं को खंगाला है जो घटनाओं की गू्ंज में दमित रह गए थे। भीष्म की प्रतिज्ञा ने उनके भीतर किस तरह की मनःस्थित का निर्माण किया, इसे समझने के लिए भी इस उपन्यास को पढ़ना बेहद जरूरी है। भीष्म स्त्री के प्रति भीतर ही भीतर निष्ठुर हो उठे थे। उनकी यही निष्ठुरता उन्हें अपने अल्पायु भाई विचित्रवीर्य के विवाह की ओर ले गयी। उन्होने नीति और मर्यादा के विरूद्ध जाकर काशी की तीन राजकन्याओं के हरण किया। भीष्म काशीराज की कन्या अंबा के तर्कों के आगे खुद को निरुत्तर पाते हैं फिर भी उनके भीतर की निष्ठुरता उनके हाथों ये अपराध कराती है।
यही भीष्म एक रोज़ हस्तिनापुर के अंधे युवराज के लिए गांधारी की आकांक्षाओं की बलि ले लेते हैं। उमेश गांधारी की आंखों से इस क्रूर समय का वर्णन करते हैं। वे लिखते हैं-गांधारी ने नंगी आंखों से जीवन का नंगा स्वरूप देख लिया। नंगा सच देख लिया। बल की विद्रूपता देख ली। पराक्रम का आतंक देख लिया। स्वार्थ का, लिप्सा का नृशंस नृत्य देख लिया….आकांक्षाओं की अनगिनत लाशों से अटी-पटी ह्दयों की समरभूमि का लोमहर्षक दृश्य देख लिया। एक रोज़ यही भीष्म शरशैय्या पर होते हैं। उस समय उनके सामने उनके द्वारा रचित इतिहास की क्रूरता और निष्ठुरता के यही प्रश्न खड़े होते हैं।तब लेखक इस मौक़े पर द्रौपदी के ज़रिए ऐतिहासिक प्रश्नो को खड़ा करता है। द्रौपदी और पितामह का संवाद अद्भुत है। जब द्रौपदी दुर्योधन की सभा में उनकी धर्मबुद्धि के बाबत प्रश्न खड़े करती है तो भीष्म दुर्योधन के दूषित अन्न के जरिए बुद्धि के दूषित होने का कारण गिनाते हैं। मगर द्रौपदी यहीं इतिहास का निर्णायक प्रश्न करती है। वो कहती है-पितामह, धर्मात्मा विदुर भी तो दुर्योधन का अन्न खा रहे थे। क्या अलग-अलग शरीरों में अन्न अलग-अलग तरह के रक्त का निर्माण करता है। भीष्म इस तर्क से निरुत्तर होते हैं। उनकी ये चुप्पी हस्तिनापुर के इस इतिहास का वो एक्सटेंशन है जो द्वापर युग से लेकर कलियुग तक एक जैसा सवाल बनकर हमारे समाज के आगे खड़ी है।
हस्तिनापुर एक्टेंशन महाभारत के अलग-अलग चरित्रों के साथ आगे बढ़ता जाता है। हर चरित्र की मनोदशा में प्रवेश कर नए सवालों की सृष्टि के साथ। ऐसा भी नहीं है कि इस उपन्यास में सिर्फ सवालों की बौछार है। इन सवालों की मीमांसा में ही समाधान के सूत्र भी छिपे होते हैं। भीष्म का अपराधबोध, विदुर के यक्ष प्रश्न, द्रोण के भीतर की धिक्कार, गांधारी के दुस्वप्न…..सभी अपने अपने आर्तनाद में समय के अमूल्य सूत्रों को समाहित किए होते हैं। कृष्ण के शब्द इस उपन्यास के माध्यम से धर्म की अद्धुत व्याख्या करते हैं। कृष्ण लिखते हैं- धर्म किताबों के पन्नों पर स्याही की शक्ल में दर्ज कोई मरी हुई चीज नही है। धर्म हर सांस में जीवित सत्य है, राजन। धर्म विवेक को कुंठित नही, प्रकाशित करता है। धर्म संवेदनहीन नही, संवेदनशील बनाता है। हस्तिनापुर एक्सटेंशन आपको विचारों की उन गहराइयों तक ले जाता है जहां सिर्फ इतिहास के ही नही, बल्कि वर्तमान के भी अनसुलझे सवालों के हल फूटते नज़र आते है। कृष्ण एक बार फिर बोल उठते हैं-युद्ध होगा, मनुष्य मरेंगे मगर मनुष्य की जिजीविषा नहीं मरेगी। मनुष्य मरेंगे मगर मनुष्य जीवन को सुंदर बनाने का संकल्प नहीं मरेगा। और आखिर में अश्वत्थामा हस्तिनापुर के इस एक्सटेंशन के सदियों सदियों तक अक्षुण्ण रहने के सत्य का संवाहक बनकर उपस्थित होता है। उसकी वाणी में समय के सत्य का साक्षात् होता है। इस पूरे उपन्यास में अलग-अलग पात्रों के ज़रिए समय का यही सत्य अपनी शाश्वत उपस्थिति का आभास कराता है। जो बीत गया है, उसका महत्व आज भी है। उसके सबक आज भी हैं। उसके आदर्श चिरंजीवी हैं। उसके असत्य में भी जीवन का एक बडा सत्य छिपा है। उसकी अनीतियों में भी नीति की परख के तार समाए हुए हैं। उमेश प्रसाद सिंह का ये हस्तिनापुर एक्सटेंशन इस मामले में सफल है कि इसने इतिहास की एक अमर कथा को वर्तमान के सरोकारों और संदर्भों से जोड़कर रखा है। यही सरोकार और संदर्भ ही किसी कलमकार की लेखकीय चेतना का प्राण होते हैं। उमेश का प्रश्नाकुल मन सबका सन्दर्भ और तथ्यपरक जबाब ढूँढता है। किताब महाभारत पर नितांत नई दृष्टि देती है। कहीं बोझिल नहीं करती है। उमेश मिट्टी से जुड़े लेखक हैं। वे साहित्य में रमे है। लेखन में आनंद लेते है। उनका लोक से लगाव आज भी है। उमेश बी.एच.यू में मेरे सहपाठी थे। उनका प्रश्नाकुल मन तभी से व्याकुल रहता था। उनकी यह व्याकुलता और जिज्ञासु प्रवृति किसी भी सौन्दर्य के पीछे साईकिल दौड़ा देती थी। उमेश तभी से पढाकू और लिख्खाड थे। अब तक अपने वजन के बराबर किताब लिख चुके होगें। पर भाषा और शिल्प दोनों में नवीनता है।
उमेश से जब पहली बार मैं मिला तो वह तीन पीस सूट पहन कर टाई बॉंधे साईकिल से बीएचयू के हिन्दी विभाग में नमूदार हुए। गेट पर ही हमें मिले। तब तक रामचंद्र शुक्ल के बाद टाई बांधने वाला हिन्दी का कोई विद्वान पहली बार मुझे मिला था। उनकी विनम्रता और सहजता ने मुझे उनका मुरीद बना दिया। वे मेरे गोल गिरोह में शामिल हो गए। इस गोल में सब तरह के लोग थे कुछ पढ़ाकू। कुछ बहुतैय पढ़ाकू, कुछ महज विश्वविद्यालय में रहने के लिए आमरण विद्यार्थी और कुछ लफ़ंगा तत्व भी। कुछ भंगेडी भी थे, कुछ गंजेंडी भी। कुछ अपनी विद्वता का प्रदर्शन करते हुए गुरूदेव को बताते कि “गुरू जी महाभारत में लिखा है। भय बिन होत न प्रीत।“ पर जो भी था आनन्ददायी था। माहौल रचनात्मक था। गुजरे दिन खूबसूरत थे। गजब का रंगीन समूह था। गोल के दूसरे मित्र प्रो. अरुण मिश्र थे। तलवार कट मूँछें। शर्ट के भीतर से संकेत देता झांकता जनेऊ। दिलफेंक स्वभाव वाले अरुण की रूचि जितनी साहित्य में थी, उतनी ही पैठ संगीत में थी। वे किताबों के साथ हारमोनियम भी रखते थे। गुलजार कहते हैं कि ग़ालिब ने अपनी ग़ज़लें जाते वक्त जगजीत सिंह को सौंप दी। मुझे लगता है जगजीत सिहं ने जाते वक्त अरुण जी को सौंप दी। अरुण की थिसिस भी हिन्दी ग़ज़लों पर थी। आजकल अरुण मोतिहारी में प्रोफेसर हैं। वे चलते फिरते गजल की किताब थे। ग़ज़लें पर ही उनका शोध भी था। वे गाते भी थे। तीसरे कवि थे प्रो. दिनेश कुशवाह। इन दिनों वह रीवा में प्रोफेसर हैं। वह कविताओं की कब्रगाह थे। जनवादी मित्र दिनेश ने इसी काया में मोक्ष ढूँढ लिया है। चौथे थे गोपाल सिंह। वे शिव का प्रसाद लेकर शिव प्रसाद सिंह की कक्षा में जाते थे। अक्सर तंरग में कुछ कर गुजरते और मुझे उस पर पानी डालना पड़ता। शोभनाथ बम्बई में मास्टर हुए। और रमाकान्त सचिवालय में अफ़सर। आजकल रमाकान्त नीलकण्ठ के नाम से अच्छी कविताए लिखते हैं। उनकी कविता पढ़ धूमिल का कहा सच जान पड़ता है कि कविता भाषा में आदमी होने की तमीज़ है। गोल में मैं ही कलम घसीट रह गया। पर बाक़ी सब मेरे अलावा हिंदी के मास्टर निकले। गोपाल ने मास्टरी ढूंढने के बजाए मास्टरी बॉंटने की ठानी। और सोनभद्र में कई पहाड़ियों पर फैला महाविद्यालय खोल लिया। जहॉं सभी प्रकार की डिग्रियॉं मिलती हैं। साहित्य से हट उनकी राजनैतिक महात्वाकाक्षॉं भी है, इसलिए सामने आने वाला हर चुनाव वो लड जाते हैं। यह दीगर है कि जीत की राह में हर बार नई रुकावट आती है। पर उन्होंने जीवन के मूल्य नहीं बदले, सिर्फ़ सन्दर्भ बदल लिए हैं। उमेश सर्जना में लगे रहे। उनका प्रश्नाकुल मन तभी से सक्रिय रहा। लिखते रहे अध्यापन में गए, पर मन नहीं लगा। मन कहीं और लग गया था शायद। फिर न जाने क्या हुआ? उमेश ने एक दिन शहर छोड़ दिया। घर, दुआर, माल, असबाब, महिला मित्रों को छोड़ कर गॉंव लौट गए। वहीं रहने लगे। अपने मूल पर चले गए। शायद इसलिए उनमें मानवीय संवेदनाएं अब भी बची है। सिर्फ शहर से नहीं, महिला मित्रों से भी तौबा कर ली। गांव में लिखना, गांव में पढ़ना चुना। इसलिए उनके लेखन में एक चोट खाई वेदना तो है ही। माटी की सुगंध भी है। पलाश गुलमोहर के रंग भी हैं। और है एक दार्शनिक दृष्टि भी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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